वैसे तो विश्वभर में प्रत्येक वर्ष कई सौ बड़ी फ़िल्में बनती हैं परन्तु उनमें से विरले ही कोई ऐसी प्रेरणादायक फिल्म होती है जो कि फिल्म निर्देशकों को उतनी प्रेरणा दे जितनी कि जापानी फिल्म 'सेवन समुराई' ने दी है। आईए और जानते हैं इस फिल्म के बारे में।
आप में से बहुत से लोगों ने हिंदी फिल्म शोले तो देखी होगी परन्तु आपने कभी यह सोचा कि इस फिल्म की प्रेरणा फिल्म के निर्देशक को कहाँ से मिली? फिल्म के निर्देशक रमेश सिप्पी को शोले बनाने की प्रेरणा मिली हॉलीवुड की फिल्म 'मेग्निफिशेंट सेवन' से। परन्तु मेग्निफिशेंट सेवन की मूल प्रेरणा थी जापानी फिल्म 'सेवन समुराई'। जैसा कि दोनों फिल्मों के शीर्षक से ही जाहिर होता है कि सेवन शब्द दोनों में समान हैं और बस समुराई की जगह मेग्निफिशेंट शब्द का प्रयोग किया गया है। परन्तु फिल्म मेग्निफिशेंट सेवन मूल रूप से फिल्म सेवन समुराई से ही प्रेरित थी। आखिर ऐसी क्या बात थी फिल्म 'सेवन समुराई' में जिसने कि कई निर्देशकों को इतना प्रेरित किया कि आज तक सेवन समुराई फिल्म निर्माण में एक मील का पत्थर बनी हुई है?
सेवन का अर्थ है सात और समुराई जापान के योद्धाओं को कहते हैं। सेवन समुराई कहानी है सात योद्धाओं की जिन्हें कि एक गाँव वाले डाकुओं से बचाव के लिए अपने गाँव में बुलाते हैं। इन सातों योद्धाओं का चयन एक तजुर्बेकार योद्धा द्वारा किया जाता है। यह सातों समुराई युद्ध कलाओं में विलक्षित प्रतिभा वाले होते हैं। परन्तु कहानी में एक विडम्बना भी है। जहां एक तरफ गाँव में खाने को बहुत काम है वहीं सभी गाँववासी इन योद्धाओं से अपनी लड़कियों को बचा कर रखना चाहते हैं। गाँव की लडकियां समुराई योद्धाओं को उनकी बहादुरी की वजह से दिलोजान से चाहती हैं। परन्तु जो गाँव वाले उन योद्धाओं से अपनी सुरक्षा चाहते हैं वहीं उनके साथ अपनी लड़कियों के संबंधों के बनाने से इतने परेशान हो जाते हैं कि अपनी लड़कियों को छुपा कर रखना चाहते हैं। इस विडम्बना को फिल्म के महान निर्देशक अकीरा कुरोसावा ने फिल्म के अंत में भी बताया है। समुराई योद्धा किसी लालच में आ कर गाँव वालों की मदद नहीं करते बल्कि ऐसा वह इसलिए करते हैं क्योंकि वैसा करना वे अपना कर्तव्य समझते हैं। हालांकि अपनी जान गवा देवे के इस कार्य को करने के लिए उन्हें मुट्ठीभर चांवल ही प्राप्त होता हैं। गाँव वालों की रक्षा करने में सातों समुराई योद्धा शहीद हो जाते हैं। फिल्म के अंत में उनकी कब्र वाले दृश्य में निर्देशक अकीरा कुरोसावा दर्शकों के सोचने के लिए एक बात छोड़ देते हैं कि असली स्वार्थी कौन था, डाकू, समुराई या गाँव वाले। देखा जाए तो गांव वाले ही असली स्वार्थी और क्रूर होते हैं जो कि अपनी रक्षा के लिए समुराई योद्धाओं की जान को दांव पर लगा देते हैं पर उन्हें नैसर्गिक सुख से भी वंचित रखते हैं।
फिल्म को प्रेरणादायक बनाने में विशेष है फिल्म का पिचराइज़ेशन (दृश्यांकन), अर्थात फिल्म को कैसे दृश्यांकित (शूट) किया गया। फिल्म निर्देशन के गुरु माने जानेवाले कुरोसावा ने बेशक अपनी हर फिल्म में अपने निर्देशन का जो जौहर दिखया कि आज भी फिल्म निर्देशन के बड़े से बड़े दिग्गज उन्हें अपना गुरु मानते हैं, पर सेवन समुराई ने इतनी फिल्मों को प्रेरित किया कि आज यह फिल्म किसी किवदंती की तरह फिल्म जगत में प्रसिद्ध है। सेवन समुराई ने फिल्म व्याकरण में नए आयाम दिए। निर्देशक अकीरा कुरोसवा ने जैसे-जैसे एक के बाद दूसरा शॉट लिया है और जैसे-जैसे उन्हें कम्पोस किया है कि आज फिल्म का एक-एक शॉट आनेवाले निर्देशकों को सिनेमा के व्याकरण के बारे में कुछ-न-कुछ सीखता है। उन दिनों जब फ़िल्में कोई अधिक साजो सामान के साथ नहीं बनती थी तब सिमित साधनों के साथ युद्ध के जटिल दृश्यों को फिल्माया गया। आज को थोड़ी सी भी जटिलताआ आए तो कम्प्यूटर ग्राफ़िक्स का प्रयोग किया जाता है (जिसमें वह मज़ा नहीं होता जो कि बिना ग्राफिक के होता था) पर सेवन समुराई में कोई कंप्यूटर ग्राफिक नहीं था। फिल्म में वर्षा के दर्शय में समुराई योद्धाओं और डाकुओं के बीच का युद्ध अपने आप में फिल्म निर्देशन का एक नायाब उदाहरण है। फिल्म के मुख्य कलाकार तोशिरो मिफुन ने अपने अभिनय से अपने चरित्र को अमर बना दिया। तोशिरो मिफुन ने कुरोसावा के साथ और भी कई फिल्मों में काम किया। वह कुरोसावा की शुरूआाती फिल्मों से ही उनके साथ जुड़ गए थे। कुरोसावा ने अपनी कई फिल्मों में उन्हीं कलाकारों को रखा जिनके साथ वह पहले भी फिल्मे कर चुके थे। कुरोसावा को फिल्म निर्माण के कार्य से बहुत प्यार था और फिल्म की यूनिट उनके लिए किसी घर के सामान थी और साथ के लोग परिवार के किसी सदस्य के सामान। एक तरफ कुरोसावा अनुशासन से फिल्म निर्देशन करते थे वहीं अपने सहयोगियों के साथ उन्हें एक परिवार के सदस्य जैसा अनुभव प्राप्त होता था। शायद अपने उसी अनुभव और फिल्म निर्माण से प्रेम के कारण कुरोसावा अपने अंतिम समय तक भी फिल्मे बनाते रहे।
सेवन समुराई बनाने का निश्चय कुरोसावा के लिए उतना सुखदायक नहीं था जितनी कि इस फिल्म की सफलता। फिल्म का बजट विशाल था जिस पर कोई निर्माताा धन लगाने को राजी न था। फिल्म में अत्याधिक कलाकारों और फिल्म स्टॉक की आवश्यक्ता थी। बड़ी मुश्किल से निर्माण शुरू हुआ। फिल्म के निर्माण में इतनी अधिक चीज़े होने के कारण यह निश्चित किया गया कि फिल्म को पेंतीस एम एम (35mm) स्टॉक की जगज सोलह एम एम (16mm) स्टॉक पर ही बनाया जाएगा। यह भी एक विडम्बना ही है कि विश्व की सबसे अधिक प्रेरणादायक फिल्म सोलह एम एम पर बनानी पड़ी। फिल्म का निर्माण शुरू तो हो गया पर उसे धन की कमी के कारण कई रोक देना पड़ा। कुछ समय रुक कर फिल्म की शूटिंग फिर से शुरू हुई और फिल्म के निर्माण को पूरा किया गया। फिल्म का निर्माण एक वर्ष तक चला जो साधारण निर्माण से चार गुना अधिक समय था। फिल्म में गर्मी के दिनों के दृश्यांकन किए जाने वाले दृश्यों को तेज सर्दी में शूट किया गया। फिल्म का सेट भी स्टूडियो में निर्मित न कर के अलग स्थान पर निर्मित किया गया। कुरोसकवा चाहते थे कि सेट ऐसी जगह और ऐसा होना चाहिए जो कि असली लगे जिससे कि कलाकारों को अभिनय करने में मदद मिले। फिल्म को एक की जगह कई कैमरों को लगा करा शूट किया गया। फिल्म की शूटिंग के बाद कुरोसावा उसे एडिट किया करते थे। कुरोसावा न केवल एक सर्वोच्च निर्देशक ही थे बल्कि फिल्म संपादन (एडिटिंग) में भी उन्हें महारथ हासिल थी। फिल्म की एडिटिंग भी फिल्म को सजीव बना देती है। फिल्म के कई दृश्यों को असली बारिश में शूट किया गया। स्टूडियो ने कई बार अपने हाथ खड़े किए पर फिल्म के निर्माण पर इतना अधिक धन लग चुका था कि उन्हें फिल्म को पूरा करना ही पड़ा।
फिल्म अपनी रिलीज़ से पहले ही चर्चा का विषय बन गई थी। फिल्म ने न केवल व्यावसायिक सफलताए ही प्राप्त की बल्कि यह आज तक विश्व सिनेमा में सर्वॉच फिल्मों की श्रेणी में आती है और कई सर्वों में तो इसे विश्व की सर्वोच्च फिल्म का स्थान प्राप्त है। हॉलीवुड के दिग्गज निर्देशकों स्टीवन स्पीलबर्ग और मार्टिन स्कोर्सीस ने अपने साक्षात्कारों में अकीरा कुरोसावा को अपना गुरु माना है और उन्होंने यह दवा भी किया है कि सेवन समुराई ने हॉलीवुड में फिल्म निर्माण की कला को इतना अधिक प्रभावित किया है कि यह कहना गलत न होगा कि हॉलीवुड की फ़िल्में सेवन समुराई की फिल्म कला के व्याकरण पर बनती हैं।
सेवन समुराई मेरी भी सबसे पसंदीदा फिल्म है। मेरे पास कुरोसावा की फिल्मों की डी. वी. डी. भी है। कुरोसावा को मैं भी अपना गुरु मानता हूँ। उनके दृश्य लेने की कला से मैं बहुत प्रभावित हुआ। हाल ही में मैंने अकीरा कुरोसावा की और फिल्मों को देखा और यह जाना कि उनकी अन्य फ़िल्में भी विश्व की बेहतरीन फ़िल्में हैं और कुरोसावा सच में विश्व के सर्वोच्च निर्देशक। यदि आप फिल्मों के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं तो इस यहां संपर्क करें : sablanian@gmail.com M. 8527533051
- निखिल सबलानिया (लेखक फिल्म और टेलीविज़न लेखन और निर्देशन में "सत्यजीत रे फिल्म और टेलीविसन संस्थान" (S.R.F.T.I.), कोलकाता से स्नातक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय से एल. एल. बी., व बी. ए. ऑनर्स इन साइक्लोजी हैं और स्वयं फिल्मों का लेखन, निर्देशन व निर्माण करते हैं))
- निखिल सबलानिया (लेखक फिल्म और टेलीविज़न लेखन और निर्देशन में "सत्यजीत रे फिल्म और टेलीविसन संस्थान" (S.R.F.T.I.), कोलकाता से स्नातक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय से एल. एल. बी., व बी. ए. ऑनर्स इन साइक्लोजी हैं और स्वयं फिल्मों का लेखन, निर्देशन व निर्माण करते हैं))






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