अमिताभ बच्चन हो या आमिर खान, आखिर क्यों श्रेष्ठ अभिनेता भी दिखावटी सामाजिक पब्लिसिटी के चक्कर में पड़े हैं
अमिताभ बच्चन भी आखिर दिखावटी सामाजिक पब्लिसिटी के चक्कर में पढ़ गए और फंस गए। हालाँकि वह एक उत्तम एक्टर हैं और मैं विशेषकर उनकी जवानी की फ़िल्में, केवल उनके अभिनय और उनकी मुस्कान के लिए देखता हूँ। ऐसा श्रेष्ठ एक्टर बहुत कम ही देखने को मिलता है। हालाँकि लोगों ने उन्हें एंग्री मैन कहा पर मुझे उनके नृत्य और मुस्कान में नाट्य कला के ऐसे रस देखने को मिलते हैं जो कि श्रेष्ठतम कलाकारों में ही होते हैं। पर जब फिल्म ही सही नहीं होगी तो दर्शकों को पसंद कैसे आएगी? यह एक विडम्बना है कि सही समय पर सही स्क्रिप्ट और सही निर्देशक का चुनाव करने में बड़े-बड़े अभिनेता भी फेल हो जाते हैं। मुझे लगता है कि फिल्मों में ऐसे गाईडस की आवश्यकता है जो प्री-प्रोडक्शन से पहले स्क्रिप्ट और डायरेक्टर का सही आंकलन लगा सके। यदि ऐसा होता है तो इस प्रकार की दिखावटी सामाजिक प्रसिद्धि पाने की आवश्यकता नहीं है। अफ़सोस कि आमिर खान भी इसी प्रकार एक दिखावटी पब्लिसिटी कर रहे हैं। यकायक उन्हें याद आ गया कि फिल्मों में महिलाओं का वेतन पुरुषों की तुलना में कम होता है। आमिर खान को इस पर प्रचार करने की आवश्यकता नहीं है, वह केवल वह दस्तावेज सार्वजानिक करे कि उनके प्रोडक्शन हॉउस ने अब तक महिलाओं और पुरषों को कितना वेतन दिया और इससे उनकी मंशा पता चल जाएगी। अफ़सोस कि अच्छे कलाकार भी जब इतना घबराया हुआ महसूस करतेंगे तो निर्माता कैसे बड़ी और अच्छी फिल्मों का निर्माण करेंगे। यह कुंठा और घबराहट इस वजह से है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री नॉलेज रिसोर्स में इन्वेस्ट नहीं करती। लेखकों की दुर्गति, निर्देशकों की अनसुनी और MBA वालों की कॉर्पोरेट घरानों में तूती बोलने के कारण बौद्धिक विकास फिल्मों से अछूता है। आप देखिए कि अब निर्माता पैसे दे कर अच्छे रिव्यू दिलाते हैं। ऐसे ही समीक्षक भी बिकाऊ हैं और वह किसी को सही प्रकार गाइड नहीं कर सकते। कुलमिला कर फिल्म बनाने से पहले कोई सही बौद्धिक कार्य न होने के कारण फ़िल्में भी घटिया बनती हैं और अच्छे अभिनेता भी सही प्रकार अवलोकन न कर पाने के कारण दिखावटी सामाजिक पब्लिसिटी करने लगते हैं।
- निखिल सबलानिया (लेखक फिल्म और टेलीविज़न लेखन और निर्देशन में "सत्यजीत रे फिल्म और टेलीविसन संस्थान" (S.R.F.T.I.), कोलकाता से स्नातक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय से एल. एल. बी., व बी. ए. ऑनर्स इन साइक्लोजी हैं और स्वयं फिल्मों का लेखन, निर्देशन व निर्माण करते हैं)


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