हिंदी फिल्म दर्शकों को भाएगी भारतीय-चीनी फिल्म "शान चांग" Hindi Movie Audience Would Love To Watch Indo-Sino Movie Xuan Zang

भारतीय सिनेमा के दर्शकों के लिए यह अच्छी खबर है कि दो वर्षों पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चीनी दौरे पर वहाँ की सरकार के साथ फिल्म निर्माण के सम्बन्ध में जो अनुबंधन हुए उसके प्रावधान में बनी पहली फिल्म "शान चांग" अब भारत के सिनेमाघरों में भी प्रदर्शित (रिलीज़) होने वाली है। हाल ही में भारत की राजधानी दिल्ली में हुए पांच देशों (भारत, चीन, ब्राज़ील, रूस और साऊथ अफ्रीका) के पहले ब्रिक्स (BRICS) फिल्म समारोह (फेस्टिवल) में इस फिल्म की विशेष स्कीनिंग की गई। रात्रि आठ बजे शो प्रारम्भ हुआ और लगभर साढ़े दस बजे तक चला। सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में दर्शकों ने बड़े चाव से इस फिल्म को देखा। मैं भी वहाँ उपस्थित था। फिल्म दर्शकों को इतनी अच्छी लग रही थी कि लोग बस बंधे-के-बंधे रह गए। फिल्म न केवल कलात्मक दृष्टी से बढ़िया (उत्तम) है बल्कि यह फिल्म आपको डेढ़ हज़ार वर्षों के प्राचीन काल में ले जाती है जहाँ आप पुराने चीन, तिब्बत और भारत के इतिहास और संस्कृति को देखते हैं। यह फिल्म एक इतिहास का वह पन्ना है जिसके बारे में बहुत से छात्र अपनी कक्षाओं में पढ़ते हैं परंतु यह पहली बार है कि वह उसे सिनेमा के बड़े परदे पर देख पाएंगे। 
ब्रिक्स फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह पर भारत के सूचना प्रसारण और शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने भी भाषण देते-देते अचानक रुक कर दर्शकों  को बताया कि उन्होंने भी चीन बौद्ध यात्री "शान चांग" के बारे में दसवी कक्षा में पढ़ा था। फिल्म को चीन, तिब्बत और भारत में शूट किया गया है। फिल्म में चीनी कलाकारों के साथ भारतीय कलाकार भी हैं। मुख्य भूमिका में चीनी अभिनेता हुआंग शिओमिंग है। 
भारतीय मुख्य कलाकारों में सोनू सूद, नेहा शर्मा, अली फज़ल, रामगोपाल बजाज, पृथ्वी जुत्शी व राजेश खेरा है। फिल्म के निर्देशक "हुओ जिआन शी" है। भारत की फिल्म निर्माण कंपनी इरोस (EROS) भी सह-निर्माता है। 
फिल्म की कहानी एक चीनी बौद्ध भिक्षु की बौद्ध धम्म को और अच्छे से सीख कर अपने देश में ले जा कर वहाँ के लोगों को बौद्ध धम्म की शिक्षा देने के लिए  की गई यात्रा और उसके संघर्ष पर है। फिल्म के प्रमुख निर्माता विश्व सिनेमा के जाने-माने और आज के सिनेमा के गुरु कहे जानेवाले "वांग कार वाई" हैं। फिल्म के निर्माण को अधियक-से-अधिक असली लोकेशनों (स्थानों) पर ही शूट किया गया है, फिर चाहे वह दुर्गम रस्ते हों या ऊँचे पहाड़ या विशाल रेगिस्तान। डिजिटल इफेक्ट कम प्रयोग किए गए हैं जिनसे दर्शकों को असली स्थानों को देखने में मज़ा आता है। 
ब्रिक्स फिल्म फेस्टिवल में फिल्म के निर्देशक "हुओ जिआन शी" भी उपस्थित थे और उन्होंने अपने अनुभवों को व्यक्त करते हुए कहा कि बेशक इस फिल्म को बनाना सरल नहीं था और एक तरफ जहाँ प्राचीन इतिहास दिखाना था वहीं दूसरी तरफ फिल्म को अधिक-से-अधिक सजीव (असली) बनाना था और इसलिए जितनी भी मुश्किलें आईं वह उनसे पीछे नहीं हुए और फिल्म को बना कर पूरा किया गया। अब हिंदी फिल्म के दर्शकों के बीच यह फिल्म आएगी और आशा है कि भारत में भी यह सब ही को अच्छी लगेगी। विद्यालय एवं विश्वविद्यालों को यह फिल्म छात्रों को अवश्य दिखानी चाहिए। फिल्म परिवार के साथ देख सकते हैं। फिल्म में न केवल अच्छे दृश्य, अच्छी कहानी और इतिहास ही है बल्कि फिल्म अच्छी शिक्षा और संस्कार भी देती है जिसकी आज के समय में बहुत आवश्यकता है।
 - निखिल सबलानिया (लेखक फिल्म और टेलीविज़न लेखन और निर्देशन में "सत्यजीत रे फिल्म और टेलीविसन संस्थान" (S.R.F.T.I.), कोलकाता से स्नातक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय से एल. एल. बी., व बी. ए. ऑनर्स इन साइक्लोजी हैं और स्वयं फिल्मों का लेखन, निर्देशन व निर्माण करते हैं)

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