सिनेमा का वह विद्यार्थी जिसने हॉरर फिल्म बना कर नए पैमाने स्थापित किए

 


 बीस साल पहले, भारत के उच्चत्तम फिल्म संस्थान में से एक में, एक छात्र ने आम छात्र फिल्मों से अलग हटकर एक हॉरर फिल्म बनाई और आज हॉरर फिल्में विश्व में सबसे अधिक लोकप्रिय फिल्मों की एक शैली है।

यह सन 2003 की बात है, जब एक युवा छात्र ने मनोविज्ञान में स्नातक और पांच साल रंगमंच करने के बाद यह सोचा कि वह भारत के उच्चत्तम फिल्म प्रक्षिक्षण संस्थान, 'सत्यजीत राय फिल्म एवं टेलीविज़न संसथान', से निर्देशन और पटकथा लेखन में स्नात्तोत्तकर पश्चात् सिनेमा में तीन वर्षीय डिप्लोमा करेगा। उनके लिए फिल्म प्रक्षिक्षण संसथान में जाना एक सपने की तरह था और उन्होंने अपना ज्यादातार समय इसी सपने को पूरा करने में लगा दिया।

लगभग उस समय, हिंदी हॉरर फिल्म बनाने वाले एकमात्र निर्माता रामसे बंधु भी हल्की रोमांटिक फिल्मों की तरफ रुख कर रहे थे। उस फिल्म प्रक्षिक्षण संसथान में किसी छात्र ने तब तक कोई भी हॉरर फिल्म नहीं बनाई थी। तो जब उस छात्र ने एक हॉरर फिल्म बनाने की सोची तो अन्य छात्रों ने उसकी फिल्म को किसी निम्नन फिल्म की तरह देखा। फिल्म में काम कर रहे लोगों के अलावा, कोई भी इस फिल्म के बारे में गंभीर नहीं था। उन्हेंबी-ग्रेडफिल्म निर्देशक का नाम दे दिया गया। इस फिल्म की स्क्रीनिंग होने के बाद भी उनके एक प्रोफेसर ने इस फिल्म को पैसे को बर्बादी कहा।

लेकिन उस छात्र ने वर्ष 2008 में वही हॉरर फिल्म दुनिया भर के फिल्म महोत्सवों में भेजना शुरू किया। उनकी मेहनत रंग लायी। इस फिल्म का चयन स्पेन, इंग्लैंड, चीन, एस्टोनिया के अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में हुआ। इस फिल्म की पटकथा को चीन के प्रमुख फिल्म संस्थान, 'बीजिंग फिल्म अकादमी', में काफी सराहना मिली। इस फिल्म को देखने के बाद हॉलीवुड के एक निर्माता ने उस छात्र को काम देने का वादा किया। और आज बीस साल बाद सब कुछ बदल चुका है। आजकल हॉरर और सुपर नेच्युरल शैली की फिल्मों और वेब सीरीज की ज़्यादा मांग है। बीस साल पहले उस छात्र की दूरदर्शिता से इस शैली का एक भविष्य देख लिया था। और यही आज की सच्चाई है और हॉरर फिल्मों की मांग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती जा रही है।

बी-ग्रेड फिल्म क्या होती है? लोगों को इस विषय पर सही जानकारी नहीं है। किसी हॉरर फिल्म को बी-ग्रेड फिल्म कहना एक बड़ी गलती है। यह शब्द अमरीका में उभरा। वहां बड़े स्टूडियों द्वारा सिनेमाघरों को पूरी तरह से नियंत्रित किया जाता था। स्टूडियों के बाहर बनने वाली फिल्में सिनेमाघरों में प्रदर्शित नहीं हो पाती थी। अमरीकी सरकार के एक कानून के बाद इस एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया और प्रमुख स्टूडियों के बाहर बनी फिल्में सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने लगी। ऐसी फिल्मों को बी-ग्रेड फिल्म कहा जाता था। यह फिल्में कलात्मक गुणवत्ता में कम नहीं थीं। यहां तक कि कई फिल्मों को विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में सम्मानित किया गया। दरअसल, कई बार प्रमुख स्टूडियों के बाहर बनी फिल्में बेहतर होती हैं और ज़्यादा मुनाफा भी कमाती हैं। स्वतंत्र रूप से बनी और बॉक्स ऑफिस पर भी भारी कमाई करने वाली विभिन्न कम बजट वाली हॉरर फिल्मों की एक लंबी सूची है।हालांकि, जब उस सिनेमा के छात्र ने अपनी हॉरर फिल्म बनाई थी, उसको इस ऐतिहासिक तथ्य की जानकारी नहीं थी। वह केवल इतना जानता था कि उसकी हॉरर फिल्म बनाने की इच्छा थी और उसने वैसा ही किया। बाद में, उनकी एक अन्य हॉरर पटकथा पर एक और हॉरर फिल्म बनाई गई और उन्होंने एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म बनाने के बाद इस शैली को लंबे समय के लिए छोड़ दिया। लेकिन अब बीस साल बाद, वह हॉरर शैली में वापसी कर रहे हैं।

एक और विरासत है जो उन्होंने अपने फिल्म संस्थान को दी। उनकी फिल्म के बाद अन्य छात्रों में हॉरर फिल्में बनाने का साहस आया। और आज अगर आप संस्थान में जाएंगे तो आपको वहां के पुस्तकालय में डरावनी फिल्मों पर एक अलग पुस्तकों की श्रेणी मिलेगी। उन्होंने केवल अपनी हॉरर फिल्म ही बनाई बल्कि सिनेमा के छात्रों का नज़रिया भी बदला और भारत के प्रमुख फिल्म संस्थानों में एक विरासत दी।

बीस साल बाद सिनेमा के वह छात्र, निखिल सबलानिया, अपनी अगली हॉरर फिल्म बनाने जा रहे हैं। उनकी पिछली फिल्म सिसकी (The Sigh) थी। अपनी अगली फिल्म और हॉरर शैली पर वह कहते हैं, “फिल्म निर्देशक हॉरर या सुपरनेच्युरल फिल्म को छूना नहीं चाहते। यह आग से खेलने या सोते हुए बाघ की पूंछ पर कूदने जैसा है। इसके लिए सिनेमा का पूरा कौशल भी चाहिए। शॉट डिज़ाइनिंग, संकलन, ध्वनि डिज़ाइन और फिल्म के प्रभाव के बारे में पहले से विचार करना होता है। ऐसी फिल्म लिखना भी सामान्य पटकथा लेखन जैसा नहीं बल्कि डिज़ाइनिंग जैसा है। दर्शकों की वांछित प्रतिक्रियाएँ प्राप्त करने के लिए आपको पूरी पटकथा को भी उसी उसी प्रकार लिखना होता है। और यकीन मानिए कि लोगों को डराना, रोमांच बनाए रखना, दर्शक अपने साथ फिल्म के अनुभव घर लेकर लौटें, यह एक बहुत मुश्किल काम है। शायद यही कारण है कि या तो फिल्म निर्देशक इस शैली में फिल्म नहीं बनाते या ऐसी फिल्म बनाने में असफल होते हैं।"

अगली हॉरर फिल्म के शीषर्क का अभी खुलासा नहीं किया गया है। यह बिना किसी संवाद या न्यूनतम संवाद की होगी। यह फिल्म भाषा की सरहदों से परे की होगी। दुनिया में किसी भी भाषा को समझने वाला यह फिल्म देख पाएगा और दर्शक सिनेमा के शुद्ध रूप का अनुभव करेंगे। बीस साल बाद निखिल सबलानिया ने एक और चुनौती ली है कि न्यूनतम या बिना संवादों के एक हॉरर फिल्म बनाएंगे। फिल्म के लिए जुझारू पेशेवरों का दस्ता बना लिया गया है और कास्टिंग चल रही है। फिल्म निर्माण के विभिन्न विभागों में कई नए लोग शामिल होंगे। कुछ राज्य सरकारों के साथ सम्पर्क किया जा रहा है जो अपने राज्यों में शूटिंग स्थल और अन्य सहायता  प्रदान कर सकते हैं। यह फिल्म 2024 तक अमरीका में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों के साथ अपनी यात्रा शुरू करेगी और इसका लक्ष्य अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों को आकर्षित करना है। वाईपल प्राईवेट लिमिटड (Vaaipl Private Limited) नामक कंपनी फिल्म का निर्माण कर रही है। हम आशा करते हैं कि एक बार फिर से हॉरर सिनेमा का वह छात्र हॉरर शैली में केवल एक और बेहत्तर फिल्म ही देगा, बल्कि साथ ही हॉरर फिल्म शैली में वैश्विक फिल्म निर्माण में एक नया आदर्श देगा।

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